बिहार चुनावों में भाजपा की ‘शतरंज’ वाली चाल; नीतीश को एनडीए के छत्र के नीचे रखना चाहती है

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बिहार की चुनावी राजनीति को इस समय वैसे ही ऑक्सीजन की जरूरत है, जैसे वेंटिलेटर पर गंभीर मरीज को होती है। पिछले 12 महीनों में बिहार को कई संकटों का सामना करना पड़ा। कोविड के दौर में पलायन से लेकर बाढ़ और आर्थिक संकट तक, ऐसी मुश्किलों से पाटलीपुत्र की भूमि जूझती रही।

यह चौंकाने वाला नहीं है कि एक जनमत सर्वेक्षण में बेरोजगारी को इस बार सबसे प्रमुख मुद्दा माना गया है। इसीलिए कई महीनों के लॉकडाउन के बाद विधानसभा चुनाव राहत के रूप में नजर आ रहा है। राजनीति से प्रेम करने वाले बिहार के पटना में एक कड़ा चुनाव ऐसा ही रोमांचक होता है, जैसे मुंबई के लिए चढ़ता सेंसेक्स।

हालांकि, इस बार बिहार चुनाव की कुछ खास बात अभी तक दिख नहीं रही है। इसकी वजह 1990 में शुरू हुए राजनीति के चरम युग का 2020 में अवसान होना हो सकता है। 1990 वह साल था, जब बिहार की राजनीति में भारी बदलाव आया था। तब लालू प्रसाद यादव पहली बार मुख्यमंत्री बने थे। लालू पिछड़ी जातियों के सशक्तिकरण के प्रतीक बन गए थे, जिन्होंने राज्य के सभी राजनीतिक समीकरणों को बदल दिया था।

अक्टूबर, 1990 में जब भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी की रथयात्रा में बिहार में प्रवेश के बाद लालू ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया तो इसने उनकी राजनीति में मंडल बनाम कमंडल का नया पहलू जोड़ दिया और मुस्लिम लालू को अपना मसीहा समझने लगे। इससे राज्य में एमवाय (मुस्लिम-यादव) समीकरण और मजबूत हो गया। आज 30 साल बाद लालू जेल में हैं, उनके बच्चे पिता के करिश्मे की बराबरी करने के लिए जूझ रहे हैं, जबकि भाजपा ने चतुराई से बिना हिंदुत्व पर समझौता किए मंडलवादी ताकतों को अपना लिया है।

हिंदीभाषी राज्यों में सिर्फ बिहार ही बचा है, जहां भगवा पताका फहराना बाकी है। बाकी हिंदी भाषी राज्यों में भाजपा का मुख्यमंत्री रह चुका है। बिहार में पार्टी मंडलवादी उभार की वजह से लंबे समय से दूसरे स्थान पर है। फरवरी 2005 में भाजपा का राज्य में वोट शेयर 10.97% था, जो 2015 में 24.42% हो गया। जबकि 2019 के आमचुनाव में एनडीए गठबंधन ने राज्य की 40 में से 39 सीटें जीत ली थीं और विधानसभा की 243 में से 223 पर बढ़त हासिल थी। इस पूरी अवधि में भाजपा ने जिस चेहरे को चुना था वह उसका अपना नहीं, बल्कि जदयू नेता नीतीश कुमार का था।

2020 में यह सब बदल सकता है। भाजपा नेतृत्व इस पर जोर दे रहा है कि नीतीश ही उसके मुख्यमंत्री पद के प्रत्याशी हैं, लेकिन सत्ता संतुलन में परिवर्तन अवश्यंभावी है। मसलन जब 2010 में भाजपा-जदयू ने चुनावों में एकतरफा जीत हासिल की, तो नीतीश की सुशासन बाबू की छवि ने लालू के जंगल राज से छुटकारा दिलाने में अहम भूमिका निभाई। अब एक दशक बाद नीतीश के नो नॉनसेंस प्रशासक व सेक्युलर नेता के दावे को ठेस लगी है। अनेक यू-टर्न और जनता से बढ़ती दूरी के कारण नीतीश एक आलोचनीय और कुछ निराश हस्ती रह गए हैं। यह पहला चुनाव है, जो ब्रांड मोदी की छवि के नीचे लड़ा जा रहा है।

भाजपा-जदयू के गठबंधन में साफ है कि नीतीश क्षेत्रीय नेता हैं, जबकि मोदी बिग बॉस हैं। 2019 में सीएसडीएस के चुनाव बाद सर्वे के मुताबिक जिन लोगों ने भाजपा को वोट दिया उनमें से एक चौथाई ने सिर्फ मोदी की वजह से दिया। बिहार के 64% लोग मोदी को प्रधानमंत्री चाहते थे।

बिहार में मोदी को मोदित्व की छवि के रूप में देखा जाता था। यानी, विकास पुरुष, हिंदुत्ववादी और इससे भी अधिक एक ओबीसी से संबंध। बिहार के नेता जहां सिर्फ अपनी जातियों के ही नेता बनकर रह गए, वहीं मोदी ने इन सीमाओं को भी तोड़ दिया।

हालांकि इसके बावजूद मोदी की भी अपनी सीमाएं है। 2015 में लालू, नीतीश व कांग्रेस ने महागठबंधन बनाकर आसानी से चुनाव जीत लिया। इसीलिए पहले से चमक कम होने के बावजूद भाजपा को नीतीश को साथ रखने की जरूरत है। यही नहीं भाजपा को मल्लाहों के स्वघोषित नेता मुकेश साहनी की की विकासशील इंसान पार्टी जैसे छोटे दलों तक भी पहुंचना पड़ा है। यूपी की ही तरह यहां भी भाजपा की सोशल इंजीनियरिंग गैर यादव पिछड़े दलों के आसपास घूम रही है।

भाजपा पिछले 15 सालों के शासन के बाद नीतीश के खिलाफ बने असंतोष के असर को कम करने के लिए मोदित्व प्लस की नीति अपना रही है। भाजपा नीतीश को व्यापक एनडीए के छत्र के नीचे तो रखना चाहती है, लेकिन साथ ही अपनी पार्टी को उनकी सरकार से दूर रखना चाहती है। इसी प्रक्रिया में भाजपा खतरनाक राजनीतिक चतुराई में लगी है।

एक ओर जहां उसने केंद्र में सहयोगी चिराग पासवान को एक प्रभावी प्रशासक की छवि के खिलाफ खुलकर बोलने की छूट दी है, वहीं उसकी यह कोशिश भी है कि एक कमजोर मुख्यमंत्री के पास भाजपा पर निर्भर रहने के अलावा कोई विकल्प न रहे।

यह ऐसी रणनीति है, जिसका उद्देश्य अगले 5 सालों में यह सुनिश्चित करना है कि भाजपा बिहार में सरकार बनाने के लिए स्थापित हो जाए और देश के तीसरे सबसे अधिक जनसंख्या वाले राज्य में भाजपा का खुद का मुख्यमंत्री बन जाए। (ये लेखक के अपने विचार हैं)



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राजदीप सरदेसाई, वरिष्ठ पत्रकार


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