पाक में विपक्ष फौज के भ्रष्टाचार पर मुखर तो इमरान पढ़ रहे कसीदे; क्या फौज के सहारे टिक पाएगी सरकार?

https://ift.tt/35gNqnQ पाकिस्तान आजकल भारी उथल-पुथल के मुहाने पर है। कोरोना के बावजूद उसके सभी प्रांतों में बड़े-बड़े प्रदर्शन हो रहे हैं। ये...

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पाकिस्तान आजकल भारी उथल-पुथल के मुहाने पर है। कोरोना के बावजूद उसके सभी प्रांतों में बड़े-बड़े प्रदर्शन हो रहे हैं। ये इमरान खान के खिलाफ तो हो ही रहे हैं लेकिन उनके सीधे निशाने पर पाकिस्तानी फौज भी है। पाकिस्तान के इतिहास में यह पहली बार है कि नवाज़ शरीफ की मुस्लिम लीग और भुट्टो परिवार की पीपल्स पार्टी, जो एक-दूसरे की जानी दुश्मन रही हैं, उन्होंने फौज के खिलाफ खुलकर बोलना शुरू कर दिया है।

नौ पार्टियों के इस गठबंधन का नारा है कि ‘इमरान हटाओ’, क्योंकि उन्हें फौज ने धांधली करके पीएम की गद्दी पर बैठाया है। इमरान खान की पार्टी ‘पाकिस्तान तहरीके-इंसाफ’ को 2018 के चुनाव में सिर्फ एक-तिहाई वोट मिले लेकिन वह 149 सीटों पर कब्जा कर सबसे बड़ी पार्टी बन गई। इमरान सरकार फौज की कठपुतली है।

इमरान ने प्रधानमंत्री पद का दुरुपयोग कर पाक फौज के सेनापति जनरल कमर जावेद बाजवा का सेवाकाल तीन साल बढ़ा दिया है। फौज व प्रधानमंत्री की सांठ-गांठ के खिलाफ प्रमुख विरोधी नेताओं ने कमर कस ली है। वे दोनों पर ऐसा वाग्बाण छोड़ रहे हैं, जैसे पहले कभी नहीं छोड़े गए।

पिछले दिनों पीपल्स पार्टी के नेता बिलावल भुट्टो की सभा को लंदन से संबोधित करते हुए नवाज शरीफ ने नया मुहावरा गढ़ा। अब तक पाकिस्तानी फौज को ‘सरकार के अंदर सरकार’ कहते थे लेकिन नवाज ने उसे ‘सरकार के ऊपर सरकार’ कह दिया। फौज के खिलाफ पहले भी आंदोलन छिड़े हैं लेकिन कोई नेता या पत्रकार उसका नाम लेकर कभी नहीं बोला।

फौज को फौज कहने की बजाय वे उसे ‘प्रतिष्ठान’ या ‘इस्टेब्लिशमेंट’ कहते हैं। लेकिन नवाज ने साफ़-साफ़ कहा कि उनकी लड़ाई इमरान से नहीं, उस फौज से है, जिसने उन्हें गद्दी पर बैठाया। विरोधी नेता आजकल फौज के भ्रष्टाचार के खिलाफ खुलकर बोल रहे हैं। जब जमाते-इस्लामी के नेता काजी हुसैन अहमद से मैं लाहौर में पहली बार मिला तो उन्होंने पूछा कि आप ‘कोर कमांडरों’ से मिले?

उनका इशारा फौज के कोर कमांडरों से था। पाक के ऊंचे फौजियों के पास जितना पैसा है, किसी सरकारी समुदाय के पास नहीं है। इमरान के सलाहकार जनरल असीम बाजवा के विरुद्ध आरोप है कि उन्होंने अरबों खरबों की संपत्तियां खड़ी कर ली हैं, जिन पर इमरान आंख मींचे हुए हैं। इमरान के मंत्रिगण इन आरोपों को देशद्रोह की संज्ञा दे रहे हैं जबकि विरोधी दल इसका दोष इमरान के माथे मढ़ रहे हैं।

विरोधी दलों ने गठबंधन के नेता के रूप में मौलाना फजलुर रहमान को चुना है, जो जमीयत-उलेमा-ए-इस्लाम पार्टी के नेता हैं। बिलावल भुट्टो या शाहबाज शरीफ ने नेतृत्व का दावा क्यों नहीं किया? इसका बड़ा कारण यह है कि उन्हें मजहबी समर्थन चाहिए।

फौज के मुकाबले मजहबी ताकतों को खड़े किए बिना काम कैसे चलेगा? मजहब के नाम पर बने पाकिस्तान में कोई मजहबी नेता आगे आ जाए तो जनता उसका समर्थन आसानी से करने लगती है। जनरल बाजवा के खिलाफ यह अभियान खुलेआम चल पड़ा है कि वे और उनके रिश्तेदार अहमदिया हैं।

अहमदिया संप्रदाय को पाक संसद गैर-मुस्लिम मानती है। वे उन्हें काफिरों से भी बदतर बताते हैं, क्योंकि वे पैगंबर मुहम्मद और कृष्ण, दोनों को मानते हैं। अब विरोधी नेताओं के रवैए में यह परिवर्तन हुआ है कि वे फौज के खिलाफ कम, जनरल बाजवा के खिलाफ ज्यादा बोल रहे हैं। कराची में नवाज की बेटी मरियम ने अपने पति सफदर की गिरफ्तारी के बाद जो बयान दिया है, उसमें फौज के प्रति नरमी दिखाई दी।

असलियत तो यह है कि अगर फौज है तो पाकिस्तान है। फौज का महत्व इस्लाम से भी ज्यादा है। यदि मजहब ही पाकिस्तान के अस्तित्व और एकता का आधार होता तो बांग्लादेश क्यों बनता? पख्तून, बलूच, सिंधी और कश्मीरी लोग अलग होने की बात क्यों कर रहे हैं? क्या वे मुसलमान नहीं हैं?

पाक की फौज पर पंजाबियों का कब्जा है। पूरा पंजाब एक तरफ और शेष पाकिस्तानी प्रांत दूसरी तरफ। फिर भी अकेला पंजाब उनपर भारी पड़ता है। पंजाब के फौजी जनरल ही हैं, जिन्होंने पाकिस्तान को जोड़े रखा है। मियां नवाज़ का गुस्सा समझ में आता है, क्योंकि फौज ने ही उन्हें बार-बार अपदस्थ किया हैं।

इमरान आजकल फौज के सम्मान में कसीदे काढ़ने से नहीं चूकते। उन्होंने नवाज़ को लंदन से वापस लाकर जेल में पटकने की पूरी कोशिश कर रखी है। शाहबाज शरीफ और आसिफ जरदारी पहले से ही कठघरे में हैं। मौलाना फजलुर रहमान को आजकल ‘इंडिया का एजेंट’ बताया जा रहा है। उन्हें अफगान आतंकवादियों का संरक्षक भी कहा जाता था।

इमरान खान ने अपनी सरकार को पिछले 27 माह में जैसे चलाया है, उससे उनकी लोकप्रियता पर आंच आई है। पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति बदतर हो गई है। मंहगाई 10% बढ़ गई है। अंतरराष्ट्रीय वित्तीय कोश ने भी पाकिस्तान का टेंटुआ कस रखा है।

अमेरिका, सऊदी अरब और यूएई, जिनके दम पर पाक थिरकता था, उन्होंने अपने हाथ खींच लिए हैं। अकेले चीन के दम पर वह कैसे काम चलाएगा। यदि विरोधी दलों का आंदोलन जोर पकड़ गया और पाकिस्तान में खून-खराबा हो गया तो हो सकता है कि इमरान का गठबंधन टूट जाए, उनकी सरकार गिर जाए और फौज ही सामने आकर खम ठोकने लगे।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)



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डॉ. वेदप्रताप वैदिक, भारतीय विदेश नीति परिषद के अध्यक्ष


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पाक में विपक्ष फौज के भ्रष्टाचार पर मुखर तो इमरान पढ़ रहे कसीदे; क्या फौज के सहारे टिक पाएगी सरकार?
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