उपेंद्र कुशवाहा खुद प्रोफेसर, लेकिन उनके गांव में हाई स्कूल नहीं, 10वीं के आगे पढ़ना है तो रोज 4 घंटे सफर करो

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बिहार की राजधानी पटना से सटा हुआ जिला है वैशाली। इसके महनार ब्लॉक में है जावज गांव। बिहार की शिक्षा व्यवस्था को ध्वस्त बताते हुए मायावती की बहुजन समाज पार्टी और असदुद्दीन ओवैसी की एआईएमआईएम के साथ गठबंधन कर मौजूदा विधानसभा चुनाव में खुद को मुख्यमंत्री का कैंडिडेट घोषित करने वाले उपेंद्र कुशवाहा का गांव है यह। बिहार की शैक्षणिक व्यवस्था में क्रांति की बात कर रहे कुशवाहा केंद्र में मानव संसाधन विकास राज्यमंत्री रहे हैं, लेकिन इस जमाने में भी यहां की छात्राओं के चार घंटे सुनसान रास्ते से 6 किलोमीटर दूर हाईस्कूल की यात्रा में बर्बाद हो जाते हैं।

लॉकडाउन में ढील के साथ एक बार फिर छात्राओं के जीवन में यह दर्द तब उभरा, जब भास्कर की टीम ने उनका हालचाल लिया। बच्चियों के माता-पिता भी बताने लगे कि केंद्र में उनके मंत्री रहते वक्त गांव के लोगों ने कई बार फरियाद लगाई, लेकिन सारी उम्मीद धरी की धरी रह गई।

दूरी बनी मजबूरी, बेटियों की पढ़ाई यहां रह जाती है अधूरी
इंटरमीडिएट तक की पढ़ाई पूरी करने के लिए गांव की ज्यादातर बेटियों को करीब 6 किमी दूर पानापुर के मकनपुर स्थित रामशरण राय इंटर कॉलेज जाना पड़ता है। इस दूरी को बेटियां साइकिल से या पैदल ही तय करती हैं। ऐसे में सवाल उनकी सुरक्षा का होता है। खेत-खलिहानों वाला इलाका होने के कारण रास्ता काफी दूर तक सुनसान है। सुरक्षा का ख्याल रखते हुए ही दुकानदार प्रमोद कुमार सिंह ने चार में से दो बेटियों की पढ़ाई बीच में ही रोक दी। पहली और दूसरी नंबर की बेटियां ग्रेजुएशन करना चाहती थीं। नौकरी के लिए आगे पढ़ना चाहती थीं, लेकिन गांव में सुविधा नहीं होने की वजह से इंटरमीडिएट तक ही पढ़ पाईं।

प्रमोद कहते हैं- “गांव के बहुत सारे ऐसे परिवार हैं, जिनकी बेटियां मैट्रिक से आगे नहीं पढ़ पाईं। अगर गांव में इंटर तक का गर्ल्स स्कूल रहता तो ऐसा नहीं होता। इसके लिए कई बार उपेंद्र कुशवाहा से कहा गया, लेकिन उनके केंद्र में मंत्री होने के बाद भी कुछ नहीं हुआ।”

जो पढ़ाई की अच्छी व्यवस्था करेगा, उसे देंगे वोट
गांव की प्रीति कुमारी अपने नेताओं से खफा हैं। पढ़ाई की अच्छी व्यवस्था नहीं होने के कारण हर दिन उनके 4 घंटे बर्बाद होते हैं। उन्हें 6 किमी दूर इंटर कॉलेज जाना पड़ता है। प्रीति अब 18 साल की हो चुकी हैं। उसका नाम वोटर लिस्ट में जुड़ गया है। वह इस चुनाव में पहली बार वोट डालेगी। प्रीति ने प्रण लिया है कि वह जातीय और लोक-लुभावन वादे के आधार पर वोट नहीं करेंगी। कहती हैं- “गांव के अंदर बेटियों के लिए बेहतर शिक्षा और पढ़ाई की व्यवस्था करने वाले नेता को ही वोट देंगे।”

राजनीति के लिए कुशवाहा ने कॉलेज से ले रखी है छुट्‌टी
वैशाली के जंदाहा में मुनेशर सिंह मुनेश्वरी समता कॉलेज है। मुनेशर सिंह उपेंद्र कुशवाहा के पिता और मुनेश्वरी देवी उनकी मां का नाम है। उपेंद्र कुशवाहा प्रोफेसर हैं। राजनीति में आने से पहले वह इसी कॉलेज में राजनीति विज्ञान पढ़ाया करते थे। इस कॉलेज में वह आज भी प्रोफेसर के पद पर हैं।

कॉलेज के सीनियर क्लर्क राकेश कुमार के अनुसार 2019 के लोकसभा चुनाव के बाद से ही कुशवाहा लगातार छुट्‌टी पर चल रहे हैं। लोग सीधे मुंह सवाल नहीं करते, लेकिन तीन-चार युवकों ने कहा कि बेहतर शिक्षा की बात करने वाले प्रोफेसर साहब इतनी लंबी छुट्टी पर रहते हुए स्टूडेंट्स के बारे में क्यों नहीं सोचते हैं?

गांव में सड़क तो है, लेकिन उस पर गाड़ी चलाना खतरे से खाली नहीं है।

सड़कों को देखकर मानेंगे नहीं कि इसने केंद्रीय मंत्री दिया था
हाजीपुर के पासवान चौक से समस्तीपुर जाने वाली सड़क पर जंदाहा से ठीक पहले दाईं ओर अंबेडकर द्वार बना हुआ है। इसी रोड से जावज गांव जाने के लिए एक पीसीसी सड़क बनी हुई है। कुछ दूर आगे बढ़ने पर सड़क ठीक है। लेकिन, बाया नदी के किनारे पहुंचने पर एप्रोच रोड की स्थिति बेहद जर्जर मिली। एक बड़ा हिस्सा टूटा हुआ मिला। पुल के पास भी स्थिति ठीक नहीं थी।

गांव में जाने पर ऐसा लगा ही नहीं कि ये इलाका केंद्र में रहे किसी मंत्री का है। हालांकि, किसान अरुण कुमार सिंह बताते हैं कि गांव आने वाली पीसीसी सड़क और नदी पर पुल तो उपेंद्र कुशवाहा ने ही बनवाया था।

घर में नहीं दिखी कोई चुनावी तैयारी, सिर्फ प्रचार गाड़ी दिखी
उपेंद्र कुशवाहा का घर काफी बड़े हिस्से में बना हुआ है। वहां उनकी प्रचार गाड़ी खड़ी मिली। घर के अंदर-बाहर चुनाव प्रचार को लेकर कोई तैयारी नहीं दिखी। आगे बढ़ने पर बड़ा दालान है। वहीं बाईं तरफ पुश्तैनी घर भी है, जहां गेट पर ताला लटका हुआ था। सामने के हिस्से में एक ऑफिस बना है।

गांव आने पर उपेंद्र कुशवाहा इसी ऑफिस का इस्तेमाल करते हैं। दालान से सटे हुए हिस्से में गौशाला है, जहां 11 गायें और भैंसें हैं। इनकी देखभाल के लिए केयरटेकर भी है। चुनावी मैदान में हुंकार भरने वाले उपेंद्र कुशवाहा के घर का वातावरण पूरी तरह से शांत मिला। किसी प्रकार का चुनावी शोर देखने को नहीं मिला।

ये उपेंद्र कुशवाहा का घर है। यहीं ऑफिस भी बना है। जब उपेंद्र गांव आते हैं, तो यहीं से काम करते हैं।

पुराने मार्केट को तोड़ बनवा रहे मॉल, इसी पर लगा आरोप
जंदाहा में उपेंद्र कुशवाहा का एक पुराना मार्केट था, जिसे तोड़कर भव्य तरीके से मॉल बनवाया जा रहा है। गांव से लेकर जंदाहा तक इस मॉल की चर्चा है और कारण यह कि कुशवाहा की पार्टी राष्ट्रीय लोक समता पार्टी में प्रदेश महासचिव रहीं सीमा कुशवाहा ने चुनाव में टिकट नहीं मिलने पर कहा था कि उपेंद्र बाबू टिकट बेचने पर आए पैसे से मॉल बनवा रहे। टिकट बेचकर कई मॉल बनवा सकते हैं।

सीमा कुशवाहा अब पूर्व सांसद राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव की पार्टी ज्वाइन कर चुकी हैं। पूर्व केंद्रीय मंत्री नागमणि ने भी पिछले लोकसभा चुनाव के वक्त उपेंद्र कुशवाहा का साथ छोड़ते समय गंभीर आरोप लगाए थे।

1985 में रखा था राजनीति में कदम
उपेंद्र कुशवाहा ने 1985 में राजनीति की दुनिया में पहली बार कदम रखा था। 1985 से 1988 तक वे युवा लोकदल के राज्य महासचिव रहे। 1988 से 1993 तक राष्ट्रीय महासचिव रहे। 1994 में समता पार्टी के महासचिव बने और 2002 तक इसी पद पर वे बने रहे। साल 2000 में पहली बार जंदाहा से विधानसभा का चुनाव लड़े और विधायक बने। उस दरम्यान उन्हें विधानसभा का उप नेता भी बनाया गया था।

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