कमाठीपुरा की 5% सेक्स वर्कर एचआईवी पॉजिटिव, लॉकडाउन में पांच महीनों से न तो दवाई मिली न एक वक्त की रोटी

बेशक मुंबई अनलॉक हो चुकी है। कुछ लोग अपने काम में लग गए हैं तो कुछ काम की तलाश में हैं, लेकिन कमाठीपुरा की तंग गलियों, सटे हुए घर, घरों के ...

बेशक मुंबई अनलॉक हो चुकी है। कुछ लोग अपने काम में लग गए हैं तो कुछ काम की तलाश में हैं, लेकिन कमाठीपुरा की तंग गलियों, सटे हुए घर, घरों के अंदर घुटन और छोटे-छोटे बदबूदार दड़बेनुमा कमरों में रह रही सेक्स वर्कर के पास न तो काम है, न सरकार इनकी सुध ले रही है। नतीजा, भूखे मरने की नौबत आ चुकी है।

कमाठीपुरा देश के बड़े रेड लाइट एरिया में से एक है, जहां पूरे भारत से औरतें आती हैं या लाकर बेची जाती हैं। यहां से सेक्स वर्कर कॉल पर बाहर नहीं जाती हैं बल्कि ग्राहक यहां आते हैं। कोरोना ने यहां के करीब 3500 सेक्स वर्कर्स को सड़क पर ला दिया है।

जिन सेक्स वर्कर की दवाएं चल रही हैं, उनकी हालत और खराब है। लॉकडाउन के दौरान सरकारी अस्पताल से दवाएं नहीं मिलीं। अब भी नहीं मिल रही हैं। इनके बच्चे स्कूल नहीं जा पा रहे हैं, कमाई के लिए ग्राहक तो है ही नहीं। ब्रॉथल की दहलीज़ पर सजी संवरी एक बूढ़ी बैठी हैं, जिन्हें ये लोग ‘मम्मी’ बुलाती हैं।

‘मम्मी’ की निगरानी में घर के अंदर तीन-चार लड़कियां देह व्यापार का कारोबार करती हैं। दाल-रोटी की तलाश में सड़क पर कई सेक्स वर्कर्स खड़ी हैं। लेकिन दूर- दूर तक कोई उम्मीद नहीं दिख रही है। बीते पांच महीनों से दिन में 100 रु की कमाई भी नहीं हो रही है।

यहां रहने वाली सेक्स वर्कर रेशमा कहती हैं, 'मैं आपको क्या बताऊं, लॉकडाउन में तो कमाठीपुरा की सभी गलियां सील कर दी गईं थी। पुलिस का सख्त पहरा था। पुलिस न तो यहां के मर्दों को बाहर घूमने देती थी न हमें घर से बाहर निकलने देती थी। कोई छिपकर आ भी जाता था तो पुलिस उन्हें दौड़ाकर मारती थी। अब तो गलियां भी खुल गईं हैं और पुलिस का पहरा भी नहीं है, फिर भी कोई ग्राहक नहीं आ रहा है।'

कमाठीपुरा में करीब 3500 सेक्स वर्कर्स रहती हैं। इसी धंधे के बल पर इनके घर परिवार और बच्चों की पढ़ाई का खर्च चलता है। कोरोना के चलते इनकी जीविका तबाह हो गई है।

सेक्स वर्कर रेखा को अस्थमा की बीमारी है। पहले वह पास के सायन अस्पताल से फ्री में दवा लेकर आती थी लेकिन अभी पांच महीने से दवाइयां खत्म हैं। अस्थमा से इस कदर वह परेशान है कि दवा के लिए हमसे ही मिन्नतें करने लगी। उसके साथ खड़ी नूरां एचआईवी पॉजिटिव है, जिसके पास पांच महीने से दवाइयां नहीं हैं।

नूरा की तरह ही यहां रह रही 5% सेक्स वर्कर एचआईवी पॉजिटिव हैं। वह न तो अपने घर वापस जा सकती हैं, न कहीं और दूसरा काम ढूंढ सकती हैं। जब तक वह कमाती थीं तो परिवार वाले उनसे पैसे ले लेते थे, लेकिन अब जब काम बंद हो गया तो परिवार ने रिश्ता खत्म कर लिया।

रेखा कहती हैं कि अभी इक्का दुक्का ग्राहक ही आ रहे हैं। एक दिन में 100-200 रु की कमाई हो रही है। पहले न तो पैसे की कमी थी न ग्राहक की। हमारे मकान का किराया भी माफ नहीं हुआ है। एक दिन का किराया 100 से 150 रु है। इस एरिया में शाम के समय सेक्स वर्कर तैयार होकर सड़कों पर आ जाती हैं। यहां उन्हें ग्राहक मिलते हैं या फिर पुराने ग्राहक आते हैं और अपनी पसंद की लड़की लेते हैं। यहां सालों से ऐसे ही होता आया है।

ताबिश खत्री पेशे से सॉफ्टवेयर इंजीनियर हैं। पास के ही एक पॉश कॉलोनी में रहते हैं। लॉकडाउन के दौरान जब उन्होंने इनके मुश्किल हालात को देखा तो सेक्स वर्कर के लिए काम करने वाली साईं संस्था के साथ जुड़ गए। ताबिश कमाठीपुरा में पांच महीने से राशन दे रहे हैं।

साईं संस्था यहां 15 दिन में एक दफा दौरा करती है और राशन, मास्क और सैनिटाइज़र बांटती है। कोरोना में सरकारी तौर पर यहां कोई जागरूकता अभियान नहीं चलाया गया लेकिन कोई भी सेक्स वर्कर मास्क के बिना नहीं दिखाई दी।

सोनिया बंगाल की रहने वाली है, जहां उसे अपने बूढ़े मां-बाप को पैसे भेजने पड़ते हैं। लेकिन लॉकडाउन की वजह से वह न तो अपना गुज़ारा कर पा रही है न ही घर पैसे भेज पा रही है। वह कहती हैं कि हम कमाई का कोई और तरीका भी नहीं अपना सकते हैं। हमारी उम्र इतनी हो गई है कि कोई हमें काम नहीं देगा।

सोनिया तो यह भी दावा करती है कि लॉकडाउन में पढ़ी-लिखी और अच्छे घरों की लड़कियां भी देह व्यापार में उतर गईं। उसने एक दो ऐप के नाम भी बताए। कहती है, 'अब जब मोबाइल पर सुंदर, पढ़ी-लिखी और कम पैसे में लड़कियां मिलेंगी तो उनका परंपरागत पेशा और दिक्कत में आएगा।'

यहां के सेक्स वर्कर्स की मदद के लिए साईं संस्था काम कर रही है। इनके लिए राशन और फल मुहैया करा रही है।

यहां की सबसे बड़ी दिक्कत हैं बच्चे। यहां सेक्स वर्कर के लगभग 500 बच्चे हैं। जो दिन में साईं संस्था द्वारा चलाए जा रहे स्कूल में और रात को एक स्वंय सेवी संस्था द्वारा चलाए जा रहे नाइट शेल्टर में जाते थे। रेखा कहती हैं कि बच्चों की जिंदगी ज्यादा नर्क हो गई है। उनकी पढ़ाई तो बंद है ही साथ ही उनके हमेशा घर रहने की वजह से सेक्स वर्कर भी अपना काम नहीं कर पा रही हैं। वो कहती हैं कि बच्चे घर में रहते हैं तो क्या धंधा करेंगे।

साई के निदेशक विनय वाता कहते हैं कि कोरोना ने जैसे दूसरे व्यापार को प्रभावित किया है उसी तरह सेक्स वर्कर्स की जिंदगी पर भी असर हुआ है। लेकिन फर्क यह है कि बाकी जगहों पर लोगों की मदद की गई लेकिन इनके लिए आगे कोई नहीं आया।

यहां न तो सरकार ने मदद की न समाज के किसी दूसरे हिस्से ने। इन लोगों के पास आने वाले ग्राहकों ने भी इनकी सुध नहीं ली। वह कहते हैं कि पेट की भूख के आगे यहां की सेक्स वर्कर घर के अंदर तो नहीं रहेंगी। वह शाम को सड़कों पर उतर जाती हैं। कोरोना से बचाव के लिए सरकार को सामान देना चाहिए या फिर इनके खाने का इंतजाम करना चाहिए।

हम कमाठीपुरा की गलियों में गए तो देखा कि यहां न तो सैनिटाइजर है, न मास्क, न ऑक्सीमीटर और न ही थर्मामीटर। जिस तरह से सेक्स वर्कर सड़कों पर ग्राहक ढूंढ रही हैं, उस हिसाब से सोशल डिस्टेंसिंग मजाक की बात लग रही है।

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