37% तक लुढ़कने के बाद भी रिकवर कर रहे हैं स्टॉक मार्केट; लेकिन सोना नहीं लौटने वाला पिछले साल के रेट पर, जानिए क्यों

कोरोनावायरस महामारी की वजह से स्टॉक मार्केट्स में जो गिरावट आई थी, उससे बाजार पूरी तरह उबरते नजर आ रहे हैं। दुनियाभर के ज्यादातर स्टॉक मार्...

कोरोनावायरस महामारी की वजह से स्टॉक मार्केट्स में जो गिरावट आई थी, उससे बाजार पूरी तरह उबरते नजर आ रहे हैं। दुनियाभर के ज्यादातर स्टॉक मार्केट फरवरी यानी कोरोनावायरस से पहले के दौर में आ चुके हैं, वहीं कुछ तेजी से आ रहे हैं।

भारत के सेंसेक्स और निफ्टी-50 ही नहीं बल्कि अमेरिका के डाउ जोंस इंडस्ट्रीयल इंडेक्स और एसएंडपी 500 इंडेक्स भी 37% तक की गिरावट के बाद 6 महीने के भीतर ही अब अपने पुराने स्तर पर लौट रहे हैं।

दूसरी ओर, सेफ हैवन असेट समझे जाने वाले सोने की कीमतों में गिरावट नजर आ रही है। सात अगस्त को 56 हजार रुपए प्रति दस ग्राम पर पहुंचने के बाद सोना लगातार फिसल रहा है। अब तक पांच-छह हजार रुपए तक की गिरावट इसमें आ गई है।

लेकिन, एनालिस्ट कह रहे हैं कि सोने की कीमतों में गिरावट का कारण सिर्फ स्टॉक मार्केट में तेजी नहीं है। बल्कि कई अन्य कारण भी हैं। ऐसे में यदि आपको लग रहा है कि स्टॉक मार्केट में तेजी के साथ सोना और सस्ता होगा, तो आपका अंदाजा गलत भी हो सकता है।

कितने गिर गए थे स्टॉक मार्केट, अब क्या है स्थिति?

कोरोनावायरस के मामले फरवरी में सामने आने लगे थे। तब तक सरकारों ने इसे गंभीरता से नहीं लिया था। लेकिन अमेरिका जैसे देशों में बढ़ते मामलों का असर शेयर बाजारों पर भी दिखा। जो शेयर बाजार फरवरी में अपने ऑलटाइम हाई पर थे, 14 फरवरी के बाद फिसलते चले गए। दुनियाभर के ज्यादातर शेयर बाजारों ने 20 से 23 मार्च के बीच बॉटम छू लिया था।

यह गिरावट इतनी तेज थी कि कोई संभल ही नहीं सका। जापान के निक्केई 225 को ही लें, 20 मार्च को वह अपने एक जनवरी के स्तर से करीब 28.67% नीचे था। इसी तरह अमेरिका का एसएंडपी 500 इंडेक्स 30.75%, सेंसेक्स 37.02%, निफ्टी 37.46%, यूके का एफटीएसई 100 इंडेक्स 33.79% तक गिर गए थे।

चीन का शंघाई कम्पोजिट इंडेक्स सबसे कम गिरा था। उसमें 23 मार्च को एक जनवरी के मुकाबले महज 12.78% की गिरावट आई थी। अच्छी बात यह है कि एसएंडपी 500 इंडेक्स, निक्केई 225 और शंघाई कम्पोजिट इंडेक्स अब इस साल की शुरुआत से ऊपर के स्तर पर है। हालांकि, अब भी उनका इस साल के शिखर पर लौटना बाकी है।

किन वजहों से आई शेयर मार्केट्स में तेजी?

जब कोरोनावायरस की वजह से अनिश्चितता का माहौल बना, तब बाजार में आई गिरावट को रोकने के लिए सरकारें भी सक्रिय हुईं। भारत में भी केंद्र सरकार ने 20 लाख करोड़ रुपए के पैकेज की घोषणा की। इसी तरह, अमेरिका सहित अन्य देशों में स्टिमुलस उपायों से गिरते बाजारों को उम्मीद बंधी।

भारत में रिजर्व बैंक ने लोन मोरेटोरियम की घोषणा की। ब्याज दरें घटाईं। केडिया कैपिटल के डायरेक्टर और रिसर्च हेड अजय केडिया का कहना है कि स्टिमुलस पैकेज ने शेयर बाजारों के लिए स्टेरॉइड का काम किया। इससे जो तेजी आई, उसे नेचरल तेजी नहीं कह सकते। जब कोरोना महामारी भारत में आई तो मार्केट गिरने लगे थे।

अब जब भारत दुनिया का नंबर दो देश बन चुका है, तब मार्केट ऊपर आ रहे हैं। आप खुद ही समझ सकते हैं कि यदि कोरोना की स्थिति नहीं सुधरी तो सरकार को फिर स्टिमुलस पैकेज लाना होगा। जिसकी सुगबुगाहट शुरू हो चुकी है। इससे बाजार में लिक्विडिटी तो आएगी, लेकिन यह दावा नहीं किया जा सकता कि कोरोना का संकट टल गया है और अब बाजार में सब अच्छा ही अच्छा होने वाला है।

तो क्या सोने की तेजी की वजह यही थी?

एंजेल ब्रोकरेज की रिपोर्ट के मुताबिक पिछले 10 साल में सेंसेक्स और निफ्टी ने 9.05% और 8.5% के सालाना औसत से वृद्धि दर्ज की है। 2010 और 2015 के बीच 2012 की मंदी के बाद भी वृद्धि देखी गई। फरवरी 2016 से फरवरी 2020 तक सेंसेक्स की वृद्धि देखें तो वह 17,500 से बढ़कर 40,000 अंकों तक पहुंच गया। साफ है कि रिस्क होने के बाद भी इक्विटी में निवेश का ट्रेंड बढ़ा है।

दूसरी ओर, 2007 में सोना 9 हजार रुपए प्रति दस ग्राम के आसपास था, जो 2016 में 31 हजार रुपए प्रति दस ग्राम तक पहुंच गया था। यानी नौ साल में तीन गुना से ज्यादा बढ़ोतरी। यह भी समझना होगा कि जब-जब ब्याज दरें घटती हैं, तब सोने में निवेश बढ़ता है।

इसी तरह का संबंध है शेयर मार्केट और सोने का। जब-जब शेयर मार्केट में गिरावट दर्ज होती है या मंदी की आहट होती है, पीली धातु की रफ्तार बढ़ जाती है। ग्लोबल कंसल्टिंग फर्म डेलोइट ने अप्रैल के आउटलुक में कहा था कि ब्याज दरों में गिरावट होगी। ऐसा ही हुआ।

आज देश ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में बैंक की ब्याज दरें एक दशक में सबसे कम हैं। आज की तारीख में भारत की बात करें तो रेपो रेट सिर्फ 4 प्रतिशत के आसपास है। ब्याज दरें कम हैं, ऐसे में लोगों के लिए सोना ही निवेश का बेहतर विकल्प बना हुआ है।

आगे क्या… क्या सोने में निवेश करना अब भी आकर्षक विकल्प है?

केडिया कैपिटल के अजय केडिया कहते हैं कि सोने में ग्रोथ साइकिल में होती है। 2008 से 2013 की साइकिल हो या 2018 से अब तक की साइकिल। सोने के रेट्स अचानक नहीं बढ़े हैं। सितंबर 2018 से इसमें तेजी आने लगी थी। यदि आप 2008 से 2013 तक की अवधि को समझेंगे तो पाएंगे कि आज की स्थिति बहुत ज्यादा अलग नहीं है।

ब्याज दरें कम हुई थी। मंदी का खतरा था, इसलिए सरकारों ने स्टिमुलस पैकेज घोषित किए थे। जियो-पॉलिटिकल टेंशन उस समय यूएस, ईरान और मिडिल ईस्ट में थे, आज भारत-चीन, अमेरिका-चीन और अमेरिका-ईरान में दिख रहे हैं। यह सब सोने के लिए फेवरेबल है।

उन्होंने कहा कि कोविड-19 की वजह से इकोनॉमी ठप थी। हमारे यहां तो जीडीपी ही निगेटिव में चली गई। यदि आप निवेशक हैं तो कहां निवेश करना चाहेंगे? आपके सामने दो ही ऑप्शन हैं- इक्विटी और सोना। अगस्त की ही बात करें तो एफआईआई ने भारत में 5,500 मिलियन डॉलर का निवेश किया है।

यह बताता है कि भारत से उम्मीदें बढ़ गई हैं। वहीं, यदि भारतीयों की मानसिकता समझने की कोशिश करेंगे तो उन्हें सोना ही आकर्षक विकल्प लगता है। हमारे यहां तो सोने में निवेश लोग तभी करते हैं जब इसके दाम बढ़ते हैं। इसका सीधा-सीधा उदाहरण है गोल्ड सोवरिन बॉन्ड में बढ़ रहा निवेश।

वह कहते हैं कि सोने की कीमतों में जो गिरावट आई है, उसकी वजह है पिछले दो महीनों में रुपए में आई मजबूती। रुपया अभी 73-74 रुपए प्रति डॉलर की रेंज में है। कुछ महीनों पहले 76-77 रुपए प्रति डॉलर तक पहुंच गया था। इससे भी सोने की कीमत कम हुई है।

लेकिन, इसे ऐसे भी समझ सकते हैं कि डॉलर में तेजी आएगी तो लॉन्ग टर्म में सोने के दाम और तेजी से बढ़ेंगे। यानी अगले साल तक सोना 60 से 70 हजार रुपए प्रति दस ग्राम तक पहुंच सकता है।

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37% तक लुढ़कने के बाद भी रिकवर कर रहे हैं स्टॉक मार्केट; लेकिन सोना नहीं लौटने वाला पिछले साल के रेट पर, जानिए क्यों
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