चार दशक में हिंदी 18% बढ़ी, बंगाली, मराठी और तेलुगु भाषा घट गई; जानिए देश में हिंदी क्यों बढ़ रही है

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14 सितंबर, यानी हिंदी भाषियों का त्यौहार। हिंदी को राजभाषा बनाने में बड़ा योगदान देने वाले व्यौहार राजेंद्र सिंह का आज जन्मदिन भी है। आज ही के दिन 71 साल पहले देवनागरी लिपि में लिखी गई हिंदी को देश की आधिकारिक भाषा के तौर पर मान्यता मिली थी।

आज इतने साल बाद भी भारत में हिंदी का दबदबा कायम है। बीते चार दशकों में हिंदी भाषी करीब 17.95 फीसदी बढ़े हैं, जबकि बंगाली, मराठी और तेलुगु समेत दूसरी भाषाओं के बोलने वालों की संख्या लगातार गिरी है। भारत के 12 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में हिंदी बातचीत के लिए पहली भाषा के तौर पर इस्तेमाल की जाती है।

भाषा जनगणना आंकड़े यहां तक बताते हैं कि उत्तर प्रदेश, दिल्ली, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में हिंदी बोलने वालों की संख्या 96% से ज्यादा है। इसके बावजूद भारत में उच्च शिक्षा, राष्ट्रीय मीडिया, ज्युडिशियरी-नौकरशाही और कॉर्पोरेट ऑफिस की भाषा अंग्रेजी बनी हुई है।

बीबीसी के अनुसार, इसका कारण यह है कि अपने पड़ोसी देश चीन की तरह भारत की कोई राष्ट्रीय भाषा का न होना है। जबकि, हिंदी केंद्र सरकार की आधिकारिक भाषा है। एक्सपर्ट्स भी हिंदी भाषा को राष्ट्रभाषा बनाने की बात कहते हैं। भारत में हिंदी की दशा और दिशा को जानने के लिए हमने एक्सपर्ट्स से उनके विचार लिए।

क्या वाकई मजबूत हुई है हिंदी?
दिल्ली यूनिवर्सिटी के हिंदी विभाग में प्रोफेसर चंदन कुमार कहते हैं कि भारत में हिंदी की दशा बहुत अच्छी है। भाषा जनगणना 2011 के अनुसार, देश में 52 करोड़ 83 लाख 47 हजार 193 लोग हिंदी बोलते हैं। इनमें पुरुषों की संख्या 27 करोड़ 66 लाख 10 हजार 187 है, जबकि हिंदी बोलने वाली महिलाएं 25 करोड़ 17 लाख 37 हजार 006 हैं। 2001 में हिंदी बोलने वाले 42 करोड़ 20 लाख 48 हजार 642 थे।

चंदन बताते हैं, "दक्षिण भारत जैसे देश के अहिंदी भाषी क्षेत्रों में हिंदी का विरोध जोरों पर था, लेकिन वहां एक नई पीढ़ी आई है, जो हिंदी को लेकर व्यवहारिक है। हिंदी उसके रोजगार की भाषा बनी है। जिन लोगों की पुरानी पीढ़ियां हिंदी के विरोध में पली-बढ़ी हैं, वे भी अब हिंदी बोल रहे हैं। हिंदी बचेगी तो देश भी बचेगा। हिंदी मजबूत हो रही है, देश मजबूत हो रहा है।"

क्या भारत में नहीं मिल रहा हिंदी को पूरा सम्मान?
दिल्ली स्थित हंसराज कॉलेज की प्राचार्या डॉक्टर रमा ने अपने लेख में लिखा कि आज पूरी दुनिया में बोलने वालों के मामले में हिंदी तीसरी सबसे बड़ी भाषा है, लेकिन अपने देश में यह संघर्ष कर रही है। डॉक्टर रमा भारत में बढ़ते अंग्रेजी के प्रभाव का कारण मैकाले की शिक्षा नीति को बताती हैं।

2019 में आई स्टेटिस्टा की एक रिपोर्ट बताती है कि अंग्रेजी और चीनी (मेंडेरियन) भाषा के बाद तीसरी सबसे बोली जाने वाली भाषा हिंदी है। वे लिखती हैं कि कुछ लोगों ने अंग्रेजी को भारत की जरूरी भाषा बना दिया, ताकि वे अंग्रेजों की गुलामी कर सकें। अंग्रेजों ने भारत के युवाओं के मन में अपनी ही भाषा को लेकर बुरी भावना भर दी।

हालांकि, वे नई शिक्षा नीति को हिंदी के समर्थन का कदम मानती हैं। जनगणना के मुताबिक, 2001 में भारत में अंग्रेजी बोलने वालों की संख्या 2 लाख 26 हजार 449 थी, जबकि 2011 की जनगणना में यह आंकड़ा 2 लाख 59 हजार 678 पर पहुंच गया था।

डिजिटल दौर ने हिंदी को क्या दिया?
स्टेटिस्टा की रिपोर्ट के मुताबिक, 2011 में अंग्रेजी भाषा के इंटरनेट यूजर्स की संख्या 6.8 करोड़ थी, जबकि भारतीय भाषाओं के मामले में यह संख्या 4.2 करोड़ थी। ऐसा अनुमान लगाया जा रहा है कि 2021 तक भारतीय भाषा के इंटरनेट यूजर्स की संख्या 53.6 करोड़ हो जाएगी, जबकि अंग्रेजी यूजर्स केवल 19.9 करोड़ रह जाएंगे।

प्रोफेसर चंदन कुमार बताते हैं कि देखते ही देखते सूचना माध्यमों और सोशल नेटवर्किंग साइट्स ने हिंदी को भारत से लेकर मध्य पूर्व तक एक रास्ता दिया है। अब दुनिया के किसी भी देश में चले जाएं। खासकर उन देशों में जहां तकनीक ज्यादा है। वहां आपको हिंदी का एक मध्यवर्ग मिल जाएगा, जिसकी घरेलू बोलचाल की भाषा हिंदी है।

2019 में फाइनेंशियल एक्‍सप्रेस में प्रकाशित एक खबर के अनुसार, बीते 10 सालों में हिंदी किताबों का पढ़ना तेजी से बढ़ा है। वेबसाइट को दिए इंटरव्यू में हिंदी किताबों के पब्लिशर शैलेष भारतवासी बताते हैं कि "ऐसा केवल ग्रामीण इलाकों में ई-कॉमर्स पहुंचने के कारण हुआ है। इससे पहले हिंदी किताबों को बांटने का कोई सिस्टम नहीं था। ऐसे में पाठकों तक पहुंचने में परेशानी होती थी।"

माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय में पत्रकारिता विभाग की प्रमुख डॉक्टर राखी तिवारी कहती हैं कि डिजिटल माध्यमों में हिंदी का प्रयोग काफी बढ़ा है और यह काफी अच्छा है। हमें हिंदी को अमल करने की चिंता करनी चाहिए, न कि उसकी गिरती हुई स्थिति की। डिजिटल दौर में हिंदी के विकास की संभावनाएं काफी ज्यादा हैं।

क्या रोमन लिपि पहुंचा रही है हिंदी को नुकसान?
पूर्व पत्रकार और पंत एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी में संपादक डॉक्टर उपेंद्र हिंदी बताते हैं कि देवनागरी के बजाए रोमन लिपि के ज्यादा उपयोग के कारण ही हिंदी की हालत खराब हो रही है। कोरियाई और देवनागरी लिपि की हिंदी ही दुनिया की सबसे सटीक भाषाएं हैं, क्योंकि दोनों ही भाषाओं में जो लिखा जाता है वही बोला जाता है।

इसके अलावा डॉक्टर उपेंद्र सोशल मीडिया पर रोमन में हिंदी लिखने और डिजिटल लिपि डेवलपमेंट नहीं होने को भी हिंदी की खराब हालत का जिम्मेदार मानते हैं। डॉक्टर उपेंद्र कहते हैं कि आईटी एक्स्पर्ट्स के कम ज्ञान के कारण ही हम अंग्रेजी और फ्रेंच के अलावा कोरियाई हिब्रू और अरबी भाषा भाषियों से भी डिजिटल लिपि सिस्टम के विकास में पिछड़ रहे हैं।

कैसे सुधरेगी हिंदी की स्थिति?
प्रोफेसर चंदन कुमार के अनुसार, हमें ट्रांसलेशन को बढ़ावा देना होगा। इसका मतलब हिंदी-अंग्रेजी अनुवाद समझा जाता है, जबकि अनुवाद को भारतीय भाषा में बदलना होगा। हमें इंजीनियरिंग, चिकित्सा, समाज विज्ञान और अन्य ज्ञान के क्षेत्रों में हिंदी की अच्छी किताबें लिखनी होंगी। हिंदी के शिक्षकों को टेक्नोलॉजी की जानकारी रखनी होगी।

डॉक्टर राखी तिवारी बताती हैं कि हमें ऑफिस, घर या दोस्तों के बीच हिंदी का ज्यादा से ज्यादा उपयोग करना चाहिए। साथ ही सरकारी कागजों में भी आसान हिंदी को जगह मिले। इसके अलावा हिंदी के कठिन शब्दों को लेकर शिक्षण संस्थाओं में लगातार प्रतियोगिता कराई जानी चाहिए।



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Roman script has spoiled the condition of Hindi and digital era has taken over the language, the rate of Hindi speakers has increased in five decades


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